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सावन के महीने में क्यों हजारों की संख्या में आते है लोग कनकी धाम में (कांकेश्वर महादेव)

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By Travel Life Angel Updated: May 13, 2026
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भगवान भोलेनाथ का पुरानी एवं ऐतिहासिक मंदिर है जिसे कनकी के नाम से जाना जाता है जहां मंदिर से लगे हुए हसदो नदी के तट महाशिवरात्रि के दिनों में भक्तजन स्नान कर सर्वमगला मंदिर के हसदो नदी के तट से जल भरकर सावन में हमें प्रत्येक सोमवार भक्तजनओ के द्वारा बोल बम बोल बम का नारा लगाते हुए श्रद्धालु आगे बढ़ते जाते जो पैदल यात्रा किया करते है शिव शंभू को जो जल अभिषेक करते हैं 

छत्तीसगढ़ में कोरबा जिले में एक छोटा सा गांव है जिसका नाम कनकी है जो हसदो नदी के तट पर बसा हुआ है जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर की दूरी पर है यहां धार्मिक स्थल ककेश्वर या चकेश्वर  महादेव मंदिर के नाम पर प्रसिद्ध  हैं ऐसा माना जाता है कि कोरबा के जमींदारों द्वारा 1857 के आसपास इस मंदिर को बनाया गया था

मंदिर पत्थर से बनाया गया है जहां शिव पार्वती का असंख्य चित्रण देखने को मिलता है जो बहुत खूबसूरती से सजाया गया है देवी दुर्गा का एक और प्राचीन मंदिर है मंदिर के दर्शन के लिए बहुत दूर दूर से लोग आते हैं मुख्य शिव मंदिर जो है प्रवेश द्वार के सामने हैं नंदी बैल का बना हुआ आकर्षक और सुंदर मूर्ति है ऐसा माना गया है इस बैल के कान में सच्चे मन से कुछ मांगे तो ओ  भी मिल जाता है

नंदी बैल के मूर्ति से थोड़ा आगे जाने पर हमे शिवलिंग मिल जाता है जो कनकी के मुख्य मंदिर है यहां शिवलिंग पर दूध का विसर्जन होता रहता है और सुंदर आकर्षक देखने को मिलता है

यह गांव घने जंगलों से घिरा हुआ है जहां प्रवासी पक्षियों का आना जाना लगा रहता है  कई पक्षियों वहां एक बहुत बड़े बरगद के पेड़ में रहते हैं  यहां कई  असंख्य तलाब भी पाया जाता हैं इस प्रावासी पक्षियों  के प्रवासी समय के दौरान देखा गया

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कनकेश्वर धाम के नाम से प्रसिद्ध यह आस्था का केंद्र

कनकेश्वरधाम कनकी में सावन माह के प्रत्येक सोमवार को मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। जिले सहित आसपास के क्षेत्रों व अन्य राज्यों से भी लोग कनकेश्वर महादेव की पूजा-अर्चना व जलाभिषेक करने आते हैं। कई श्रद्धालु कांवर में जल लेकर बोल बम का जयकारा लगाते हुए आते हैं और दर्शन लाभ प्राप्त करते हैं। कनकी गांव के कनकेश्वर महादेव इस क्षेत्र के लोगों के लिए धार्मिक आस्था का केंद्र हैं। हजारों लोग कतार में लगकर अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए पूजा-अर्चना करते हैं। यहां विराजमान कनकेश्वर महादेव को भुईफोड़ महादेव भी कहा जाता है, जिनकी उत्पत्ति की कथा ग्रामीणों द्वारा बताई जाती है।

कोरबा के कनकी गांव में हसदेव नदी के तट पर स्थित कनकेश्वर महादेव का मंदिर 200 साल पहले कोरबा के जमींदार परिवार द्वारा बनाया गया था। इस मंदिर पर एक स्वयंभू शिवलिंग स्थित है, जिसे उसी गांव के बैजू नामक एक गौपालक ने खोजा था। भगवान कनकेश्वर के अलावा इस मंदिर में प्राचीन काल की मूर्तियों का अनूठा संग्रह है। मड़वारानी मंदिर के पास खुदाई के दौरान मिली मूर्तियों को इस मंदिर में रखा गया है। इसके साथ ही कनकेश्वर मंदिर में एक शिवलिंग है जिसे भक्तों द्वारा सभी दिशाओं में घुमाया जाता है जिसे चक्री शिवलिंग या चक्रेश्वर महादेव कहा जाता है। वर्तमान में यह क्रिया बंद कर दी गई है। इस मंदिर परिसर में प्राचीन काल से अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित की गई हैं।

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स्वयंभू कैसे प्रकट हुए?

कंकेश्वर महादेव मंदिर की प्राचीन कथा काफी प्रचलित है। कहा जाता है कि प्राचीन समय में इस गांव में बैजू नाम का एक ग्वाला रहता था जो सभी गांव वालों की गायों को चराया करता था। जिस स्थान पर भगवान कनकेश्वर विराजमान हैं, उस समय इस स्थान पर घना जंगल हुआ करता था। जिस स्थान पर एक गाय प्रतिदिन दूध देने जाती थी। प्रतिदिन दूध गिराने के कारण बैजू को गाय के मालिक से डांट खानी पड़ती थी। बैजू उस गाय पर नजर रखने लगा। फिर एक दिन बैजू ने देखा कि गाय एक छोटे से पत्थर पर दूध गिरा रही है। तब बैजू पत्थर देखने गया और गुस्से में उस पत्थर पर मारने लगा जिस पर दूध गिर रहा था तो पत्थर छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट गया। फिर उसी रात बैजू को सपना आया कि जिस पत्थर को उसने पत्थर समझकर हटाने की कोशिश की थी, वह कोई आम पत्थर नहीं बल्कि एक शिवलिंग था। तब बैजू ने सुबह जाकर देखा तो शिवलिंग के साथ चावल के कुछ टुकड़े भी थे तब बैजू ने सभी गांव वालों को इसकी जानकारी दी, तब से उस स्थान पर कनकेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण कर पूजा-अर्चना शुरू कर दी गई, जो वर्तमान में छत्तीसगढ़ में भगवान शिव के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है।

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सावन में सुरक्षा के खास इंतजाम: शिव आराधना के लिए सावन विशेष माना जाता है. इस बार भक्तों को पांच सोमवार तक उपवास रखने का सौभाग्य मिला है. शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की बढ़ने वाली भीड़ को लेकर व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई है. प्राचीन शिवालयों में कनकेश्वर धाम कनकी में माह भर मेले जैसा वातावरण बन रहता है. सोमवार को सर्वाधिक भीड़ रहती है. कोरबा शहर के सर्वमंला मंदिर से जल लेकर श्रद्धालु पैदल यात्रा करते हुए मंदिर पहुंचते हैं. यहां लगने वाले मेले में व्यापारी दुकान लगाते हैं

korba kankeshwar dham

गाय शिवलिंग पर करती थी दूध से अभिषेक: पुरातत्व संग्रहालय में पदस्थ पुरातत्व मार्गदर्शन हरि सिंह कनकी से ईटीवी भारत ने इस शिव मंदिर के बारे में जानने की कोशिश की. उन्होंने बताया, “वर्तमान में जो पुजारी वहां हैं, उनकी 18वीं पीढ़ी पहले उनके पूर्वज को जमीन से शिवलिंग प्राप्त हुआ था. गाय एक स्थान पर जाकर एक पत्थर पर अपना दूध अर्पण कर देती थी. उसके थन से अपने आप ही दूध बहकर इस स्थान का अभिषेक करता था, लेकिन इस गाय के मालिक का गांव वाले से झगड़ा हुआ था कि कोई उसकी गाय को बिना बताए दूह लेता है. ऐसा कई बार हुआ, एक बार वर्तमान पुजारी पुरुषोत्तम के 18वीं पीढ़ी पहले वाले परदादा को सपना आया. सपने में शिवजी बोले, “वह गाय मेरी भक्त है और मैं स्वयं वहां विराजमान हूं.” जब वहां की खुदाई की गई तब शिवलिंग पाया गया. तभी से इस मंदिर की ख्याति है. मंदिर का निर्माण कर पूजा-अर्चना तब से शुरू कर दी गई. इस मंदिर में कुछ मूर्तियां हैं, जो 11वीं और 12वीं शताब्दी की हैं. उन मूर्तियों का पौराणिक महत्व भी है.”

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प्रवासी पक्षियों का भी है बरेसा: धार्मिक महत्व के साथ ही कनकी का शिव मंदिर प्राकृतिक महत्व का भी एक केंद्र है. प्रत्येक साल जो प्रवासी पक्षी यहां आते हैं. वह मंदिर के आसपास मौजूद पेड़ पर ही अपना घोंसला बनाते हैं. यहां-वहां प्रजनन करते हैं और फिर मीलों की यात्रा कर वापस लौट जाते हैं. प्रवासी पक्षी वैसे तो मानसून का संदेश लेकर आते हैं, लेकिन वह मंदिर के आसपास ही अपना घोंसला बनाते हैं. इसलिए इन्हें भी शिव भक्त भोले शंकर की आस्था से जोड़कर देखते हैं

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मंदिर की दूरी 

उरगा से 12 किलो मीटर के दूरी पर स्थित हैं जहा हम बस या ऑटो, रिक्शा के सहायता से जा सकते है कोरबा से 20किलो मीटर के दूरी पर है

आइए जानते हैं कनकी का मंदिर कैसे बना

मनोज शर्मा का मानना है कि एक गाय रोजा का इस शिवलिंग पर दूध चढ़ाते थी एक दिन गाय को ऐसा करते ग्वालो ने देख लिया गुस्से में उसने जहा दूध गिर रहा था वहा डंडे से प्रहार कर दिया जैसे ही उसने डंडा मारा तुमने की आवाज आई वहा कनकी के टुकड़े बिखरे हुए दिखाई दिया  जब  वह की सफाई करवाई गई तो वहा एक टूटा हुआ शिवलिंग दिखाई दिया बाद में उसी जगह पर मंदिर का स्थापना किया गया

उन्होंने बताया कि  कनकी टुकड़े  मिलने के कारण मंदिर का नाम कानकेश्वर महादेव रखा गया मंदिर के बनने के बाद वहां गांव ही बन गया जिस गांव का नाम कनकी रखा गया हर साल सावन में यहां भक्तजनों के भीड लगती है हजारों के संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के आते हैं एक महीने तक यहां लगातार मेला लगा रहता है जहा  धार्मिक लोगो का भीड़ उमड़ा हुआ दिखाई देता हैं

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