माँ चंद्रहासिनी की कथा और इतिहास, चंद्रहासिनी मंदिर की एक अनोखी कहानी

यहां महानदी के किनारे चंद्रहासिनी देवी का मंदिर स्थित है। नवरात्रि की पूर्व संध्या पर यहां प्रतिवर्ष एक भव्य उत्सव का आयोजन किया जाता है। यह एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल भी है। ओडिशा जैसे अन्य राज्यों से भी लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं। दिन-प्रतिदिन यह एक प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थल बनता जा रहा है।

छत्तीसगढ़ के सबसे प्राचीन मंदिरो में से एक है जांजगीर चांपा जिले के चन्द्रपुर की छोटी सी पहाड़ी के ऊपर विराजित है मां चंद्रहासिनी। देवी मां चंद्रहासिनी को समर्पित मंदिर महानदी के तट पर स्थित है। छत्तीसगढ़ राज्य के जांजगीर जिले में स्थित, चंद्रहासिनी देवी मंदिर रायगढ़ के आसपास के स्थानों की खोज करने वाले पर्यटकों के लिए एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण है। यहां आने वाले दैनिक अनुष्ठानों के अलावा, मंदिर विशेष रुप से उन पूजाओं के लिए जाना जाता है जो नवरात्रि के दिनों में यहां आयोजित की जाती है। नवरात्रि के नौ दिनों में यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या सबसे अधिक होती है।

मां चंद्रहासिनी मंदिर का इतिहास

चंद्रमा के आकार की विशेषताओं के कारण उन्हें चंद्रहासिनी और चंद्रसेनी मां के नाम से जाना जाता है. बताया जाता है कि चंद्रसेनी देवी ने सरगुजा को छोड़ दिया और उदयपुर और रायगढ़ होते हुए महानदी के किनारे चंद्रपुर की यात्रा की. महानदी की पवित्र शीतल धारा से प्रभावित होकर माता रानी विश्राम करने लगीं. इसके बाद उन्हें नींद आ गई. वर्षों व्यतीत हो जाने पर भी उनकी नींद नहीं खुली. एक बार संबलपुर के राजा की सवारी यहां से गुजरी. चंद्रसेनी देवी पर गलती से उनके पैर लग जाने से चोट लग गई, जिससे वे जाग गए. फिर एक दिन देवी ने उन्हें एक सपने में दर्शन दिए और उन्हें एक मंदिर बनाने और वहां एक मूर्ति स्थापित करने के लिए कहा. हर साल चैत्र नवरात्रि के अवसर पर सिद्ध शक्तिपीठ मां चंद्रहासिनी देवी मंदिर चंद्रपुर में महाआरती के साथ 108 दीपों की पूजा की जाती है.

108 दीपों के साथ महाआरती

कहा जाता है कि नवरात्रि पर्व के दौरान 108 दीपों के साथ महाआरती में शामिल होने वाले भक्त मां के अनुपम आशीर्वाद का हिस्सा बनते हैं. सर्वसिद्धि की दाता मां चंद्रहासिनी की पूजा करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. नवरात्रि उत्सव के दौरान भक्त नंगे पांव मां के दरबार में पहुंचते हैं और कर नापकर मां की विशेष कृपा अर्जित करते हैं.

चंद्रहासिनी मंदिर की एक अनोखी कहानी

माँ चंद्रहासिनी देवी : माँ की पावन धरा पर आश्विन नवरात्रि और चैत्रनवरात्रि में दृश्य देखने लायक रहती है। माता के जयकारों से पूरा वातावरण गूंज उठता है, इस वातावरण में अपने आपको शामिल कर पाना किसी महान काम से कम
नहीं, यह सौभाग्य की बात होती है। माता की कीर्ति चारों दिशाओं में फैली हुई है। जिसका गुणगान करने प्रान्त के ही नहीं वरन अन्य प्रान्तों से भी लोग आते हैं।यहाँ वर्षभर भक्तों का तांता लगा रहता है। मेले के अवसर पर भक्तों की लम्बी कतारें लगी रहती है।

लोग अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए ज्योतिकलश नवरात्रि के अवसर पर जलाते हैं। कई श्रद्धालु मनोकामना पूरी करने के लिए यहां बकरे व मुर्गी की बलि देते हैं ( जो सरकारी कानूनों के तहत कभी बंद तो कभी चालू रहता है।) यहाँ बने पौराणिक व धार्मिक कथाओं की झाकियां समुद्र मंथन, महाभारत की द्यूत क्रीड़ा आदि, माँ चंद्रहासिनी के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं का मन मोह लेती है। 

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पैर लगने से माता की नींद टूट गई थी : यहाँ प्रचलित किंवदंति के अनुसार हजारों वर्षो पूर्व माता चंद्रसेनी देवी सरगुजा की भूमि को छोड़कर उदयपुर और रायगढ़ से होते हुए चंद्रपुर में महानदी के तट पर आ गई। महानदी की पवित्र शीतल धारा से प्रभावित होकर माता यहां पर विश्राम करने लगी । वर्षों व्यतीत हो जाने पर भी उनकी नींद नहीं खुली।

एक बार संबलपुर के राजा की सवारी यहां से गुजरती है, तभी अनजाने में चंद्रसेनी देवी को उनका पैर लग जाता है और
माता की नींद खुल जाती है। फिर स्वप्न में देवी उन्हें यहां मंदिर निर्माण और मूर्ति स्थापना का निर्देश देती हैं। संबलपुर के राजा चंद्रहास द्वारा मंदिर निर्माण और देवी स्थापना का उल्लेख मिलता है। देवी की आकृति चंद्रहास अर्थात चन्द्रमा के सामान मुख होने के कारण उन्हें ‘‘चंद्रहासिनी देवी’’ भी कहा जाने लगा। राजपरिवार ने मंदिर की व्यवस्था का भार यहां के एक जमींदार को सौंप दिया। उस जमींदार ने माता को अपनी कुलदेवी स्वीकार करके पूजा अर्चना की। इसके बाद से माता चंद्रहासिनी की आराधना जारी है।

अन्य मुर्तिया

मंदिर परिसर में अर्द्धनारीश्वर, महाबलशाली पवन पुत्र, कृष्ण लीला, चीरहरण, महिषासुर वध,चारों धाम, नवग्रह की मूर्तियां, सर्वधर्म सभा,शेषनाग शय्या तथा अन्य देवी-देवताओं की भव्य मूर्तियां जीवन्त लगती हैं। इसके अलावा मंदिर परिसर में ही स्थित चलित झांकी महाभारत काल का सजीव चित्रण है, जिसे देखकर महाभारत के चरित्र और कथा की
विस्तार से जानकारी भी मिलती है।

दूसरी ओर भूमि के अंदर बनी सुरंग रहस्यमयी लगती है और इसका भ्रमण करने पर रोमांच महसूस होता है। वहीं माता चंद्रसेनी की चंद्रमा आकार प्रतिमा के एक दर्शन मात्र से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। चंद्रहासिनी माता का मुख मंडल चांदी से चमकता है, ये नजारा देश भर के अन्य मंदिरों में दुर्लभ है।

मां नाथलदाई

कुछ ही दुरी (लगभग 1.5कि.मी.) पर माता नाथलदाई का मंदिर है जो की रायगढ़ जिले की सीमा अंतर्गत आता है। चंद्रहासिनी मंदिर के कुछ दूर (लगभग 1.5कि.मी.) आगे महानदी के बीच ( पुल के बिच से जाना पड़ता है मंदिर ) मां नाथलदाई का मंदिर स्थित है, जो की रायगढ़ जिले की सीमा अंतर्गत आता है। कहा जाता है कि मां चंद्रहासिनी के दर्शन के बाद माता नाथलदाई के दर्शन भी जरूरी है। अन्यथा माता नाराज हो जाती है। यह भी कहा जाता है कि महानदी में बरसात
के दौरान लबालब पानी भरे होने के बाद भी मां नाथलदाई का मंदिर नहीं डूबता।

चंद्रहासिनी मंदिर जाने का सर्वोत्तम समय

वैसे तो माता के दर्शन के लिए आप कभी भी जा सकते है। यहां वर्ष भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। वहीं वर्ष के दोनों
नवरात्रि पर्वो पर मेले जैसा माहौल रहता है। छत्तीसगढ़ के अलावा अन्य राज्यों के श्रद्धालु यहां नवरात्रि में ज्योति कलश प्रज्जवलित कराकर मां से अपने सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। कई श्रद्धालु मनोकामना पूरी करने के लिए यहां बकरे व मुर्गी की बलि देते हैं।

चंद्रपुर के प्रमुख पर्यटक आकर्षण

अपने समृद्ध कोयला भंडार के कारण चंद्रपुर को अक्सर “काले सोने का शहर” कहा जाता है, और यह सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक चमत्कारों का खजाना है। यह शहर प्राचीन मंदिरों, ऐतिहासिक किलों और लुभावने वन्यजीवों का एक अनूठा संगम प्रस्तुत करता है, जो इसे एक विविधतापूर्ण और आकर्षक पर्यटन स्थल बनाता है।

धार्मिक स्थल

  • महाकाली मंदिर : चंद्रपुर का एक प्रमुख आध्यात्मिक स्थल और विशिष्ट आकर्षण महाकाली मंदिर है। देवी काली के श्रद्धालु हर मंगलवार को यहां आकर जीवंत और पवित्र वातावरण का अनुभव करते हैं।
  • भद्रावती जैन मंदिर : यह जैन तीर्थस्थल अपनी सुंदर, शांत और विस्तृत मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध एक शांत स्थान है। यह पर्यटकों और श्रद्धालुओं दोनों के लिए एक सुखद और शांतिपूर्ण स्थल है।
  • अंचलेश्वर महादेव मंदिर : गोंड किले के निकट स्थित, यह प्राचीन शिव मंदिर धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। लोग यहां भगवान शिव के पवित्र पैर के अंगूठे की पूजा करते हैं, और मंदिर अपनी जटिल आकृतियों और अलंकरणों के साथ इस क्षेत्र की प्राचीन स्थापत्य शैली को प्रदर्शित करता है।

किलों

  • चंद्रपुर किला : 1400 और 1500 के दशक में गोंड राजाओं ने इस किले का निर्माण एक महत्वपूर्ण रक्षा व्यवस्था के रूप में करवाया था। इसकी दीवारें और प्रवेश द्वार गोंड शिल्प कौशल और युद्ध कौशल का बेहतरीन उदाहरण हैं।
  • बल्लारपुर किला : यह बॉक्स के आकार का किला बल्लारपुर शहर में स्थित है। इसका निर्माण खंडाक्या बल्लाल शाह ने करवाया था और इसकी मजबूत दीवारें और मीनारें इसकी सुदृढ़ संरचना को दर्शाती हैं।
  • मानिकगढ़ किला : 800 के दशक का यह गढ़ 507 मीटर ऊँची पहाड़ी की चोटी पर स्थित है, जिसका निर्माण नाग शासकों ने करवाया था। यह स्थान अपने अद्भुत दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है और पैदल यात्रा के शौकीनों के बीच काफी लोकप्रिय हो गया है।

राष्ट्रीय उद्यान

  • ताडोबा-अंधारी बाघ अभ्यारण्य:
    ताडोबा-अंधारी बाघ अभ्यारण्य को आधिकारिक तौर पर 21 दिसंबर, 1995 को घोषित किया गया था। इसमें पहले से मौजूद ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान (1955 में स्थापित) और अंधारी वन्यजीव अभ्यारण्य (1986 में घोषित) का विलय करके महाराष्ट्र का दूसरा सबसे बड़ा बाघ अभ्यारण्य बनाया गया। यह अपने बाघों की आबादी के लिए प्रसिद्ध है और सफारी के कई प्रकार के अनुभव प्रदान करता है। बाघों के अलावा, पर्यटक तेंदुए, भालू और कई पक्षी प्रजातियों को देख सकते हैं। घने जंगल और विविध पारिस्थितिकी तंत्र वन्यजीव फोटोग्राफी और पक्षी अवलोकन के लिए उत्कृष्ट अवसर प्रदान करते हैं। कुल क्षेत्रफल – 1,727.17 वर्ग किलोमीटर।

प्राकृतिक अजूबे

  • नीला पानी : यह एक शांत प्राकृतिक क्षेत्र है जो पेड़-पौधों से घिरा हुआ है और आराम करने और अपनी ऊर्जा वापस पाने के लिए बिल्कुल उपयुक्त है।
  • रामाला तालाब : अगर आप अपने परिवार के साथ सुकून भरी छुट्टियां बिताना चाहते हैं, तो यह जगह आपके लिए बिल्कुल सही है। शांत जल और चारों ओर के मनमोहक दृश्यों के साथ, यह जगह हर किसी को बेहद पसंद आती है।

प्रमुख राजमार्गों, रेलवे लाइनों और हवाई अड्डों के निकट चंद्रपुर की रणनीतिक स्थिति यात्रियों के लिए सुगम आवागमन सुनिश्चित करती है। शहर में जीवंत स्थानीय बाजार और इराई झील जैसे शांत स्थान भी हैं, जो शाम की सैर और अवकाश गतिविधियों के लिए उत्कृष्ट अवसर प्रदान करते हैं।

चंद्रपुर में सांस्कृतिक इतिहास और प्राकृतिक दृश्यों का मिश्रण सभी को आकर्षित करता है, चाहे आप इतिहास और आध्यात्मिकता में रुचि रखते हों या फिर आप प्रकृति और रोमांच के शौकीन हों।

कैसे पहुंचे मंदिर

हवाई मार्ग – यहां का निकटतम हवाईअड्डा भिलाई या रायपुर है। रायुपर से जांजगीर पहुंचने के लिए आप टैक्सी या बस का उपयोग कर सकते हैं।

रेल मार्ग – जांजगीर का निकटतम रेलवे स्टेशन जांजगीर -चाम्पा रेलवे स्टेशन हैं, जो यहां से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर है। आप स्टेशन से टैक्सी या बस लेकर मंदिर पहुंच सकते हैं। 

सड़क मार्ग – अगर आप शहर में है तो आप टैक्सी या ऑटो-रिक्शा लेकर सीधे मंदिर जा सकते हैं। मंदिर शहर से लगभग 15 से 20 किलोमीटर पर है। छत्तीसगढ़ राज्य परिवहन की बसे भी यहां नियमित रुप से चलती है।

मेरा अनुभव

चंद्रपुर का एक दर्शनीय जगह है जहा पहुचने के बाद लगता है की ये जगह बहुत शांत वातावरण दिखाई देने लगती है सुबह की ओ सुनहरी हवा और आसपास के मन को मोह लेने वाली धुन मन को मोहित कर लेती है भविष्य को देखते हुए, चंद्रपुर क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता, वन्यजीवों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का लाभ उठाकर पर्यटन क्षेत्र को व्यापक बनाने का लक्ष्य रखता है। ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए भी पहल की जा रही है,

चंद्रपुर एक अनूठा पर्यटन स्थल है जो वन्यजीव, आध्यात्मिकता और इतिहास का संगम है। शहर के विविध आकर्षण इसे रोमांच के शौकीनों, एकल यात्रियों और परिवारों के लिए एक आदर्श गंतव्य बनाते हैं। तो, अपनी यात्रा की योजना बनाने के लिए तैयार हो जाइए और इस अद्भुत शहर के अनेक खजानों को खोजिए। यह क्षेत्र वन्यजीव प्रेमियों, फोटोग्राफरों और पक्षी प्रेमियों द्वारा अक्सर देखा जाता है जो यहां की प्राकृतिक सुंदरता और वन्यजीवों को देखने और उनकी तस्वीरें लेने आते हैं।