गोवर्धन पूजा, दिवाली के पांच दिवसीय त्योहार का अभिन्न अंग है। यह त्योहार दीपावली के अगले दिन यानी बलिप्रतिपदा को मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की बेहद लोकप्रिय लीला की याद में मनाए जाने वाले इस पर्व में श्री कृष्ण और गोवर्धन पर्वत के प्रतीक की पूजा की जाती है। यह त्योहार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाता है। इस दिन भक्त भगवान श्रीकृष्ण को 56 भोग लगाते हैं और गाय के गोबर का गोवर्धन पर्वत बनाकर विधि-विधान से उसकी पूजा करते हैं।
1 दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा क्यों मनाया जाता है
गोवर्धन पूजा का दिन भगवान कृष्ण को समर्पित है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इंद्र देवता के क्रोध से बचाने के लिए श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत को उठाने की याद में दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा मनाई जाती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर ब्रजवासियों को इंद्रदेव के प्रकोप से बचाया था।
1.1 क्यों मनाया जाता है गोवर्धन पूजा का पर्व ?
गोवर्धन पूजा का उत्सव भागवत पुराण में बताई गई पौराणिक कथाओं पर आधारित है.धार्मिक मान्यता है कि भगवान कृष्ण ने वृंदावन के लोगों से कहा कि वर्षा के देवता इंद्रदेव को प्रसाद चढ़ाने के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाए. जब इंद्रदेव को इस बारे में पता चला तो वे क्रोधित हो गए और उन्होंने वृंदावन पर मूसलाधार बारिश करनी शुरू कर दी. इस बारिश ने जल्द ही भयावह रूप ले लिया. इस बारिश से वृंदावन वासियों को बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लिया, जिससे लोगों और जानवरों की इस भारी आपदा से रक्षा कर सकें.

1.2 गोवर्धन पूजा पर क्यों लगाया जाता है 56 भोग
पौराणिक कथा के अनुसार, वृंदावन के ग्रामीण हर वर्ष इंद्र देव की पूजा आराधना करते ताकि उनकी कृपा से वर्षा हो सके और खेती में कोई बाधा न आए. लेकिन श्रीकृष्ण ने गांववालों को समझाया कि वर्षा की असल वजह प्रकृति है पेड़, नदियां व पर्वत है. इस पर गांववालों ने इंद्र की पूजा छोड़ दी जिससे क्रोधिक होकर इंद्रदेव ने मूसलाधार बारिश की. इससे वृंदावनवासियों को बचाने के लिए श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर उसकी आड़ में सभी गांववालों सुरक्षित किया. जब स्थिति सामान्य हुई तो वृंदावनवासियों ने श्रीकृष्ण के लिए सम्मान व्यक्ति किया और माता यशोदा ने 56 भोग बनाकर भगवान को अपने हाथों से खिलाया.
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1.3 गोवर्धन पूजा की सामग्री (Govardhan Puja Samagri)
रोली, अक्षत, चावल, बताशा, नैवेद्य, मिठाई, गंगाजल, पान, फूल, खीर,सरसों के तेल का दीपक,गाय का गोबर गोवर्धन पर्वत की फोटो, दही, शहद, धूप-दीप, कलश, केसर, फूल की माला, कृष्ण जी की प्रतिमा या तस्वीर, गोवर्धन पूजा की कथा की किताब।
2 गोवर्धन पूजा विधि (Govardhan Puja Vidhi In Hindi)
गोवर्धन पूजा सुबह या शाम किसी भी समय कर सकते हैं।
इस दिन गाय के गोबर से गोवर्धन महाराज की आकृति बनाकर उन्हें फूलों से सजाया जाता है।
गोवर्धन की नाभि वाली जगह पर एक मिट्टी का दीपक रखा जाता है। फिर इस दीपक में दही, शहद, बताशे, दूध, गंगा जल आदि चीजें डाली जाती हैं और पूजा के बाद इसे प्रसाद रूप में सभी लोगों में बांट दिया जाता है।
गोवर्धन की पूजा के समय लोटे से जल गिराते हुए और जौ बोते हुए सात बार परिक्रमा की जाती है।
इसके अलावा इस दिन गाय, बैल और खेती में काम आने वाले पशुओं की भी विशेष पूजा होती है
- गोवर्धन पूजा के दिन सुबह जल्दी उठकर शरीर पर तेल मलकर स्नान करें.
- स्नान करने के बाद साफ कपड़े पहनें और अपने इष्ट देवता या देवी का ध्यान करें.
- इसके बाद घर में गाय का गोबर लेकर आएं. ध्यान रहे कि गोबर शुद्ध हो.
- गोबर में कंकड़ पत्थर नहीं होने चाहिए और न ही उसमें मिट्टी मिली हो.
- गाय के गोबर से भगवान गोवर्धन की आकृति बनाएं.
- गिरिराज पर्वत बनाकर उसपर कढ़ी चावल और अन्नकूट का भोग लगाएं.
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- गोवर्धन भगवान की आकृति शयन मुद्रा में बनाएं.
- भगवान गोवर्धन की नाभि की जगह मिट्टी का दीपक रखें.
- नाभि वाले दीपक में दूध, दही, शहद, बताशे और गंगाजल रखें.
- बीच में दीपक रखने के बाद गोवर्धन कथा सुननी चाहिए.
- ऐसा कहा जाता है कि घर में पुरुष गोवर्धन पूजा करते हैं.
- भगवान की आकृति को फूलों से सजाएं और गोवर्धन भगवान का स्मरण करें.
- इसके बाद पूजा शुरू करते हुए भगवान गोवर्धन को नैवेद्य और फल चढ़ाएं.
- भगवान गोवर्धन के आगे दीप जलाएं और उनकी 7 बार परिक्रमा करें.
3. गोवर्धन पूजा का महत्व
गोवर्धन पूजा को देवताओं के राजा इंद्र के घमंड को तोड़ने का प्रतीक माना जाता है. द्वापरयुग में भगवान श्रीकृष्ण ने लोगों से कहा कि वे गोवर्धन की पूजा करें. उनकी बात मानकर लोगों ने गोवर्धन पूजा की तो इंद्र नाराज हो गए क्योंकि उस पूजा में देवताओं का अंश नहीं मिला. उन्होंने मूसलाधार बारिश की, जिससे ब्रज क्षेत्र आंधी, पानी और तूफान से घिर गया.
तब भगवान श्रीकृष्ण ने 7 दिन तक अपनी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत को उठाए रखा, जो नगरवासियों का रक्षक बना. बाद में इंद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ तो उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी. उसके बाद से हर साल गोवर्धन पूजा होने लगी.गोवर्धन पूजा पर अन्नकूट का भोग लगाया जाता है.

3.1 महोत्सव के पीछे की कथा :
पौराणिक कहानियों और हिंदू शास्त्रों के अनुसार, वृंदावन के लोगों ने बारिश और तूफान के देवता भगवान इंद्र को विस्तृत भोजन देने की प्रथा का पालन किया करते थे। उन्हें ऐसा करने के लिए पर्याप्त समय दिया गया था ताकि उन्हें समय पर वर्षा और अच्छी फसल के साथ आशीर्वाद मिले। हालांकि कृष्ण ने इस प्रथा पर सवाल उठाया क्योंकि वे मानते थे कि यह अभ्यास गरीब किसानों पर बोझ है क्योंकि इससे उन्हें भव्य भोजन तैयार करने के लिए भारी प्रयास करना पड़ता था। कृष्ण ने जल्द ही अपनी सूझबूझ से पूरे गांव को इन भेंटों को बंद करने के लिए आश्वस्त किया। श्री श्री रवि शंकर जी भी इसका समर्थन करते हुए कहते हैं की उन दिनों की धार्मिक गतिविधियों के खिलाफ कृष्ण ने भी विद्रोह किया था। आज भी यह अच्छी तरह से ज्ञात है कि पूरे समाज ने कृष्ण की सलाह पर, गायों की देखभाल (गोवर्धन पूजा) और स्वयं के ज्ञान का सम्मान करने के लिए, इंद्र को बलिदान करने वाली पूजा को समाप्त कर दिया है। उन्होंने अन्नकूट को भी प्रोत्साहित किया, जहां सभी के लिए भोजन है।
निष्कर्ष
गोवर्धन पूजा, जिसे अन्नकूट भी कहते हैं, भगवान कृष्ण द्वारा इंद्र देव के क्रोध से ब्रजवासियों की रक्षा करने की स्मृति में मनाई जाती है। इस दिन प्रकृति, अन्न और पशुधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। गोवर्धन पर्वत को गोबर या मिट्टी से बनाकर और ‘छप्पन भोग’ अर्पित करके इसकी पूजा की जाती है। यह त्योहार भक्ति, समाज सेवा, पर्यावरण संरक्षण और मानसिक शांति का प्रतीक है।
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